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1857 का संग्राम बगावत नहीं देश की आजादी का पहला संघर्ष: नाईक

1857 का संग्राम बगावत नहीं देश की आजादी का पहला संघर्ष: नाईक

लखनऊ, 11 जून (वार्ता)  11 Jun 2019      Email  

लखनऊ, 11 जून  उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि अंग्रेजों ने प्रथम संग्राम को बगावत का नाम दिया, जिसे वीर सावरकर ने प्रमाणित किया कि यह बगावत नहीं देश की आजादी का पहला संघर्ष है। 

श्री नाईक मंगलवार को यहां राजभवन में डा0 राकेश कुमार बिसारिया की पुस्तक ‘लखनऊ मण्डल में 1857 का स्वतंत्रता संग्राम’ का विमोचन किया। इस अवसर पर श्री नाईक ने अमर शहीदों को नमन करते हुए कहा कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम देश की आजादी का प्रथम संग्राम था। अंग्रेजों ने इस प्रथम संग्राम को बगावत का नाम दिया, जिसे वीर सावरकर ने प्रमाणित किया कि यह बगावत नहीं देश की आजादी का पहला संघर्ष है। इतिहास वास्तव में साहित्य नहीं है बल्कि प्रमाणिकता से समाज के सामने सच्चाई लाने का काम करता है।

उन्होंने कहा कि इतिहासकार की दृष्टि अलग-अलग हो सकती है पर तथ्य एक रहता है। इतिहास में पायी गयी सच्चाई का संवर्धन हो। इतिहास से ही भविष्य बनता है, इसलिए ऐतिहासिक गलतियों से सबक लेकर इन्हें ना दोहराने का प्रयास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब किसी विषय पर चर्चा होती है तो नई-नई बातें सामने आती है।

श्री नाईक ने कहा कि लखनऊ की रेजीडेंसी 1857 के संग्राम का जीता जागता प्रतीक है। स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी होने के नाते रेजीडेंसी का उचित रखरखाव एवं संवर्धन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह 13 अक्टूबर, 2015 को रेजीडेंसी गये थे और सुझाव दिया था कि देश की आजादी से जुड़ा ‘लाइट एण्ड साउण्ड’ कार्यक्रम का आयोजन हो, जिससे अधिक से अधिक लोगों को जानकारी हो सके। 

उन्होंने कहा कि 10 मई, 1857 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से आजादी का पहला संग्राम शुरू हुआ था। इस दृष्टि से वह शहीदों को नमन करने 10 मई, 2019 को रेजीडेंसी गये, जहां उन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक वृृत्तचित्र भी देखा और करीब तीन माह बाद 15 अगस्त से रेजीडेंसी में ‘लाइट एण्ड साउण्ड’ कार्यक्रम की शुरूआत हो गयी।

राज्यपाल ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि पुस्तक सरल भाषा में लिखी गयी है। इस पुस्तक को लखनऊ मण्डल के सभी पुस्तकालय में विशेषकर महाविद्यालय स्तर के शिक्षण संस्थानों में, पढ़ने के लिये उपलब्ध होना चाहिए। उन्होंने लखनऊ की गंगा-जमुनी संस्कृति की चर्चा करते हुए कहा कि 1857 में देश के सभी हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समाज के लोगों ने मिल जुलकर देश के लिये लड़ाई लड़ी थी। शायद यही कारण है कि लखनऊ में आपसी सौहार्द और प्रेम अधिक महसूस किया जाता है। उन्होंने कहा कि सब मिलकर काम करते हैं तो समाज को लाभ होता है।

इस मौके पर लेखक डा0 राकेश कुमार बिसारिया ने अपने पुस्तक पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम केवल भारत के लिये ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिये एक मिसाल है। आजादी का यह संघर्ष केवल शहर तक सीमित न रहकर गांव-गांव फैला था। उन्होंने कहा कि इस संघर्ष में अमीर, गरीब, किसान, मजदूर, हिन्दू, मुस्लिम सब ने मिलकर भाग लिया।

इस अवसर पर श्री योगेश प्रवीन तथा जाफर मीर अब्दुल्लाह नवाब ने भी अपने विचार रखे। डा0 बिसारिया राजकीय हुसैनाबाद इण्टर कालेज में शिक्षक हैं।


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