नयी दिल्ली .... रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि राष्ट्र की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट और दृढ़ नीति के साथ आगे बढ़ते भारत के लिए दिवंगत लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवास कुमार सिन्हा जैसी विभूतियां प्रेरणास्रोत हैं। श्री सिंह ने लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में यहां आयोजित स्मृति व्याख्यान के दौरान वीडियो संदेश में यह बात कही। लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा भारतीय सेना के विशिष्ट अधिकारी थे, जिन्होंने बाद में नेपाल में भारत के राजदूत तथा असम और जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के रूप में भी सेवा दी। रक्षा मंत्री ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए राष्ट्र के प्रति उनकी अटूट निष्ठा और समर्पण की सराहना की। उन्होंने कहा कि लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा ऐसे महान सैनिक, राजनयिक और राज्य के कार्यकारी प्रमुख थे जिन्होंने हमेशा राष्ट्र को सर्वोपरि रखा।
रक्षा मंत्री ने अपने संदेश में उस समय का भी उल्लेख किया जब 1926 में जन्मे लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा मोर्चे पर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में देश का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने 1947 में पाकिस्तान समर्थित बलों के कश्मीर की ओर बढ़ने के दौरान भारतीय सेना की पहली 'एयरलिफ्ट' को श्रीनगर तक समन्वित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारतीय और ब्रिटिश स्टाफ कॉलेजों में उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन और पेशेवर दक्षता की सराहना करते हुए रक्षा मंत्री ने उन्हें असाधारण बौद्धिक क्षमता वाला साहसी अधिकारी बताया।
श्री सिंह ने सैन्य खुफिया निदेशक, एडजुटेंट जनरल तथा विभिन्न कमान पदों पर रहते हुए भारतीय सेना को आधुनिक सोच और संस्थागत मजबूती प्रदान करने के लिए लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा के प्रयासों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका योगदान जारी रहा। नेपाल में भारत के राजदूत के रूप में उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ किया और असम तथा जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के रूप में सुरक्षा और विकास के लिए कार्य किया। उन्होंने कहा कि यदि भारत को सुरक्षित, आत्मनिर्भर और समृद्ध राष्ट्र बनना है तो जनता को लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा के आदर्शों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल अनिल चौहान ने लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा को सैनिक-राजनेता, विद्वान योद्धा और चरित्रवान व्यक्ति बताया। सशस्त्र बलों के कर्मियों से उनके सैन्य और नागरिक कार्यकाल से सीख लेने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि वरिष्ठ नेतृत्व को ऐसी संस्कृति विकसित करनी चाहिए जहां पेशेवर सैन्य शिक्षा, विचार-विमर्श और ईमानदारी को वीरता के समान महत्व दिया जाए। उन्होंने कहा," मध्य स्तर के अधिकारियों को अपने शरीर के प्रशिक्षण के साथ-साथ अपने मस्तिष्क में भी उतनी ही मेहनत से निवेश करना चाहिए। युवा अधिकारियों और अन्य रैंकों को कड़ा प्रशिक्षण लेना चाहिए, अनुशासन को महत्व देना चाहिए, साथ ही आत्ममंथन की आदत विकसित करनी चाहिए, दृढ़ता के साथ नेतृत्व करना चाहिए लेकिन संवेदनशीलता भी बनाए रखनी चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि साहस केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि नैतिक स्पष्टता में भी निहित होता है।"
उन्होंने कहा कि पूर्व सैनिकों और मीडिया को भी सशस्त्र बलों की विश्वसनीयता बनाए रखने में भूमिका निभानी चाहिए, न केवल युद्ध में मिली जीतों को, बल्कि शांति के समय राष्ट्र निर्माण में किए गए संयमित, नैतिक और शांत प्रयासों को भी उजागर करना चाहिए।
साइबर, अंतरिक्ष, सूचना और संज्ञानात्मक क्षेत्रों तक फैले आधुनिक युद्ध की बढ़ती जटिलताओं पर प्रकाश डालते हुए जनरल चौहान ने ऐसे सैनिक-विद्वानों की आवश्यकता पर बल दिया जो सोचने और विश्लेषण करने में सक्षम हों। उन्होंने सैनिकों से आह्वान किया कि वे लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा के वर्दी में साहस, जिज्ञासु बुद्धि और संविधान के प्रति उनकी निरंतर निष्ठा को अपने जीवन में सफलतापूर्वक समाहित करें। उन्होंने कहा, भारतीय सैनिक न केवल सीमाओं और नागरिकों की रक्षा करेगा, बल्कि भारत की नियति को आकार देने में भी योगदान देगा।
इस अवसर पर सेना के तीन पूर्व प्रमुख जनरल एनसी विज, जनरल दीपक कपूर और जनरल दलवीर सिंह उपस्थित थे, साथ ही सेना उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल पीपी सिंह भी मौजूद थे। समारोह में लगभग 300 सेवारत और सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी तथा लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा के परिवार के सदस्य शामिल हुए।