नयी दिल्ली.... भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के नेता और राज्यसभा सांसद संदोष कुमार पी ने आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 को लेकर की गई टिप्पणियों का कड़ा विरोध करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। उन्होंने इन टिप्पणियों को पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए खतरा करार दिया है।
अपने पत्र में श्री संदोष कुमार ने कहा कि आरटीआई अधिनियम नागरिकों को सशक्त बनाने और लोकतांत्रिक निगरानी को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था, जिसे यूपीए-प्रथम सरकार के दौरान वाम दलों के निर्णायक समर्थन से लागू किया गया।
उन्होंने कहा कि यह अधिनियम पारदर्शिता और जवाबदेही को संस्थागत रूप देने की दिशा में एक सचेत राजनीतिक निर्णय था, जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना और राज्य को सार्वजनिक जांच के दायरे में लाना था।
सीपीआई सांसद ने चेतावनी दी कि अधिनियम की भावना को कमजोर करने का कोई भी प्रयास संवैधानिक शासन की बुनियाद पर प्रहार होगा। उन्होंने आर्थिक सर्वे में आरटीआई अधिनियम की "पुनः समीक्षा" के सुझाव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि आंतरिक विचार-विमर्श को संरक्षण देने के नाम पर ऐसे कदम भ्रष्टाचार को वैधता दे सकते हैं और गलत कार्यों को ढकने का माध्यम बन सकते हैं।
गौरतलब है कि गुरुवार को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण के एक खंड में कहा गया था कि लगभग दो दशक बाद आरटीआई अधिनियम की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है और यह सुझाव दिया गया था कि अंतिम निर्णय का हिस्सा बनने से पहले ब्रेनस्टॉर्मिंग नोट्स, वर्किंग पेपर्स और ड्राफ्ट टिप्पणियों को छूट दी जा सकती है।
श्री संदोष कुमार ने आर्थिक सर्वे द्वारा पारदर्शिता को प्रभावी शासन में बाधा के रूप में प्रस्तुत किए जाने पर भी चिंता जताई। उन्होंने इस दृष्टिकोण को मूल रूप से त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं खुलापन से नहीं, बल्कि गोपनीयता, मनमानी और गैर-जवाबदेह सत्ता से कमजोर होती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में आरटीआई ढांचे को पहले ही कमजोर किया गया है।
2019 के संशोधनों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इससे सूचना आयोगों की स्वतंत्रता प्रभावित हुई और केंद्र सरकार को सूचना आयुक्तों के कार्यकाल व सेवा शर्तों पर अधिक नियंत्रण मिला। इसके अलावा, आरटीआई नियमों में किए गए प्रक्रियागत बदलावों से नागरिकों के लिए सूचना प्राप्त करना और कठिन हो गया है।
व्यापक संदर्भ में उन्होंने कहा कि पत्रकारों, आरटीआई कार्यकर्ताओं और व्हिसलब्लोअर्स को लगातार धमकियों और दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जबकि भ्रष्टाचार उजागर करने वालों के लिए कानूनी सुरक्षा अपर्याप्त बनी हुई है। इस पृष्ठभूमि में उन्होंने आगाह किया कि आर्थिक सर्वे में अपनाया गया दृष्टिकोण केवल अकादमिक नहीं, बल्कि इसके गंभीर राजनीतिक निहितार्थ हैं।
प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की अपील करते हुए सीपीआई सांसद ने आर्थिक सर्वेक्षण से आरटीआई से संबंधित टिप्पणियां हटाने और पारदर्शिता, जवाबदेही तथा नागरिकों के जानने के अधिकार के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराने का आग्रह किया।