नई दिल्ली ... सुप्रीम कोर्ट में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) मामले में याचिकाकर्ता रहे कार्यकर्ता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कहा कि वे अंतिम फैसला सुनने के लिए अदालत नहीं गए थे। उन्होंने आगे कहा कि उनके विचार में फैसला तो बहुत पहले ही तय हो चुका था और अब सिर्फ लिखित दस्तावेज और बारीकियाँ ही बाकी थीं। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को एसआईआर प्रक्रिया संचालित करने की शक्ति को बरकरार रखते हुए कहा कि इससे लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को नई जान मिलती है। यह फैसला चुनाव आयोग पर लगे आरोपों के बाद आया है, जिसमें आलोचकों का दावा था कि मतदाता सूची के शुद्धिकरण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने के पीछे राजनीतिक मकसद था।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी फैसला सुनाया कि मतदाता सूची से नाम हट जाना नागरिकता खोने के समान नहीं है। यह फैसला याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए उन आरोपों के बीच आया है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल परोक्ष रूप से नागरिकता प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है। यादव ने आरोप लगाया कि तीन दिनों तक दलीलें सुनने के बाद, अदालत ने एसआईआर की संवैधानिकता की जांच करने के बजाय शिकायत निवारण और मध्यस्थता पर ध्यान केंद्रित किया, और प्रभावी रूप से संवैधानिक अदालत के बजाय उपभोक्ता मंच की तरह व्यवहार किया। यादव ने आगे दावा किया कि जब अदालत ने एसआईआर के बाद मतदाता सूचियों में कथित खामियों को दूर किए बिना या मुख्य मुद्दों पर पहले निर्णय लिए बिना ही भारतीय चुनाव आयोग को बिहार चुनाव कराने की अनुमति दे दी, तो मामला प्रभावी रूप से तय हो गया था।