नई दिल्ली ... सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सबरीमाला केस की सुनवाई के दौरान मंदिरों के रीति-रिवाजों का जिक्र हुआ। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि मंदिरों में सिर्फ खास समुदाय की एंट्री और बाहरी लोगों की मनाही से समाज बंटेगा। यह हिंदु धर्म के लिए ठीक नहीं है।
उन्होंने आगे कहा कि मान लीजिए (सबरीमाला केस को छोड़कर), अगर यह कहा जाए कि सिर्फ गौड़ सारस्वत लोग ही एक मंदिर में आएं या कांची मठ के लोग सिर्फ कांची ही जाएं, दूसरे मठ (जैसे शृंगेरी) न जाएं तो यह ठीक नहीं होगा। बल्कि जितने ज्यादा लोग अलग-अलग मंदिरों और मठों में जाएंगे, उतना ही धर्म मजबूत बनेगा। उधर केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट वैद्यनाथन ने कहा कि इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं, जब धर्म से जुड़े विवाद संवेदनशील होते हैं। वहां अदालतें हस्तक्षेप नहीं करतीं हैं। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने गुरुवार को धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों में लगातार तीसरे दिन सुनवाई की। इसमें विभिन्न धर्मों में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट बोला मान लीजिए (सबरीमाला केस को छोड़कर), अगर यह कहा जाए कि सिर्फ गौड़ सारस्वत लोग ही एक मंदिर में आएं या कांची मठ के लोग सिर्फ कांची ही जाएं, दूसरे मठ (जैसे शृंगेरी) न जाएं तो यह ठीक नहीं होगा। बल्कि जितने ज्यादा लोग अलग-अलग मंदिरों और मठों में जाएंगे, उतना ही धर्म मजबूत बनेगा। आर्टिकल 17 (छुआछूत खत्म करना) बहुत ताकतवर प्रावधान है। यह सिर्फ कानून के तहत अपराध नहीं है, बल्कि संविधान इसे अपराध घोषित करता है। यह कानूनी ही नहीं, संवैधानिक स्तर पर भी गंभीर मामला है। अगर सरकार सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाती है और उसका असर धार्मिक प्रथाओं पर पड़ता है, तो उसका असर अनुच्छेद 26 (धार्मिक संस्थाओं के अधिकार) पर भी पड़ सकता है। यह कहना सही नहीं है कि अनुच्छेद 26 पर असर नहीं पड़ेगा। इस सवाल का जवाब सिर्फ थ्योरी से नहीं दिया जा सकता। यह हर केस के हिसाब से तय होगा। केंद्र सरकार के तर्क दिया कि अगर कोई मंदिर सिर्फ अपने समुदाय के लोगों के लिए रखना चाहता है, तो उन्हें सरकार या आम जनता से फंड (पैसा/दान) नहीं लेना चाहिए। अगर आप दूसरों को बाहर रखते हैं, तो उनसे मदद भी नहीं ले सकते। अगर सिर्फ आर्टिकल 26 के आधार पर देखें, तो मंदिर में प्रवेश से जुड़ा कानून गलत हो सकता है। धार्मिक संस्था को यह अधिकार है कि कौन मंदिर में आएगा, यह वह खुद तय करे। अगर प्रवेश या पूजा धार्मिक नियमों से तय होता है, तो यह धर्म का हिस्सा है। जबरन एंट्री कराने वाला कानून इस अधिकार का उल्लंघन है। केरल में पुर्तगालियों ने सीरियन ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों को कैथोलिक बनाने की कोशिश की। आयरलैंड में ब्रिटिश शासन के दौरान कैथोलिकों के साथ भेदभाव होता था। ऐसे धार्मिक विवाद संवेदनशील होते हैं, इसलिए अदालतें आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं करतीं। अगर मंदिरों में शाकाहारी भोजन परोसा जा रहा है और कोई मांसाहारी भोजन चाहता है, तो वह किसी संप्रदाय से यह नहीं कह सकता कि यह उसका अधिकार है और उसे वही परोसा जाए।