नयी दिल्ली.... शीर्ष अदालत ने सोमवार को केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से एक याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें मांग की गयी थी कि मतदान के समय मतदान केंद्र पर मतदाताओं की उंगली और आइरिस (आंख की पुतली) के आधार पर बायोमेट्रिक पहचान की जाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने हालांकि यह साफ कर दिया कि पांच राज्यों की विधानसभाओं के लिए चल रहे चुनावों में मतदाताओं की उंगली और आइरिस से बायोमेट्रिक पहचान करना मुमकिन नहीं है। लेकिन पीठ ने कहा कि इस मुद्दे की जांच की जा सकती है ताकि भविष्य के चुनावों में इसे लागू किया जा सके।
अदालत ने नोटिस जारी करते हुए अपने आदेश में कहा, "आने वाले चुनावों के लिए उंगली और आइरिस से बायोमेट्रिक पहचान पर विचार नहीं किया जा सकता। क्या अगले संसदीय या राज्य विधानसभा चुनावों में इस तरीके को अपनाया जाना चाहिए, इसकी जांच की जरूरत है।"
जब याचिकाकर्ता वकील ने एक ऐसे प्रावधान का जिक्र किया जिसके तहत चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली बुराइयों, जैसे कि फर्जी मतदाता और किसी और की जगह वोट डालना को खत्म करने के लिए बायोमेट्रिक पहचान को अपनाया जा सकता है, तो पीठ ने कहा, "चुनाव की निष्पक्षता के लिए कुछ भी किया जा सकता है, इसके लिए अधिकार होना चाहिए। हो सकता है कि इन पांच राज्यों में ऐसा न हो लेकिन 2027 के अगले चुनावों में ऐसा हो सकता है।"
पीठ को हालांकि इस चरण पर दखल देने को लेकर कुछ हिचक थी। पीठ ने कहा कि अगर भारतीय चुनाव आयोग मतदान केंद्र पर मतदाताओं की बायोमेट्रिक पहचान करने का फैसला करता है और वित्त मंत्रालय इसके लिए पैसे देने से मना कर देता है, तो इस चरण में कोर्ट का दखल हो सकता है।