नयी दिल्ली...केंद्रीय नवीन एवं नवीनीकृत ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने मंगलवार को कहा कि भारत साल अगले पांच साल में 100 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।
वैश्विक पवन ऊर्जा परिषद (जीडब्ल्यूईसी) की रिपोर्ट "विंड एट द कोर: ड्राइविंग इंडियाज ग्रीन एम्बिशन्स एंड इंटरनेशनल इन्फ्लुएंस" के अनावरण के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में एक वीडियो संदेश में श्री जोशी ने कहा, "भारत दुनिया के सबसे महत्वाकांक्षी ऊर्जा परिवर्तनों में से एक को क्रियान्वित कर रहा है। हम 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिसमें 100 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता शामिल है। नवीकरणीय ऊर्जा मिश्रण में पवन ऊर्जा के लगभग एक-चौथाई योगदान की उम्मीद के साथ, भारत न केवल स्वच्छ ऊर्जा के जुड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है, बल्कि हम भविष्य का निर्माण भी कर रहे हैं।"
रिपोर्ट का अनावरण नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने किया। इसमें बताया गया है कि साल 2030 तक भारत की पवन ऊर्जा क्षमता 51 गीगावाट से दोगुनी होकर 107 गीगावाट पर पहुंच सकती है। हालांकि एनआरईएल, आईईए, डब्ल्यूआरआई और लॉरेंस बर्कले जैसे संगठनों की रिपोर्टें 2030 तक 121-164 गीगावाट पवन ऊर्जा की सिफारिश करती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रिड संबंधी चिंताओं का समाधान, आरपीओ अनुपालन को मजबूत करना, और बोली प्रक्रियाओं को राज्य की जरूरतों के अनुरूप बनाना ऊर्जा संयंत्रों को पूरी क्षमता तक पहुंचा सकता है।
जीडब्ल्यूईसी और इंडियन विंड टर्बाइन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईडब्ल्यूटीएमए) के अध्यक्ष गिरीश तांती ने कहा कि वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जिसमें पवन ऊर्जा न्यूनतम लागत वाली ऊर्जा परिवर्तनों को गति देने में महत्वपूर्ण साबित हो रही है। साल 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा से वैश्विक बिजली की लगभग आधी आपूर्ति होने की उम्मीद है, जिसमें पवन ऊर्जा का योगदान लगभग 20-25 प्रतिशत होगा। भारत भी इसी राह पर चलने के लिए तैयार है और अपनी पवन क्षमता को दोगुना करके 100 गीगावाट और 2050 तक 452 गीगावाट तक बढ़ाएगा।
जीडब्ल्यूईसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बेन बैकवेल ने कहा, "भारत की पवन ऊर्जा क्षमता को 2030 तक 100 गीगावाट से अधिक तक बढ़ाने से आर्थिक विकास, विनिर्माण विस्तार और व्यापक ऊर्जा पहुंच संभव हो सकती है। रिपोर्ट दर्शाती है कि इस क्षेत्र में 1,54,000 नौकरियां मिलने की संभावना है। भारत इस समय दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा पवन उपकरण निर्माण केंद्र है और 2030 तक वैश्विक मांग के 10 प्रतिशत की आपूर्ति कर सकता है।