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समानता के सच्चे पैरोकार थे अंबेडकर
समानता के सच्चे पैरोकार थे अंबेडकर
अरविंद जयतिलक    14 Apr 2017       Email   

डॉ. अंबेडकर सिर्फ  हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों और सामाजिक भेदभाव के ही विरोधी नहीं थे, वे इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी बड़े आलोचक थे। वे मुस्लिमों में व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के भी आलोचक थे। उन्होंने लिखा है कि मुस्लिम समाज में तो हिंदू समाज से भी कहीं अधिक बुराइयां हैं और मुसलमान उन्हें भाईचारे जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छिपाते हैं। उन्होंने मुसलमानों द्वारा अर्जल वर्गों के खिलाफ  भेदभाव, जिन्हें निचले दर्जे का माना जाता था, के साथ मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की निंदा की। वे स्त्री-पुरुष समानता के पक्षधर थे। उन्होंने इस्लाम धर्म में स्त्री-पुरुष असमानता का जिक्र करते हुए कहा कि बहुविवाह और रखैल रखने के दुपरिष्णाम शब्दों में व्यक्त नहीं किए जा सकते, जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है, जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। अगर गुलामी खत्म हो जाए, फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जाएगी। उन्होंने इस्लाम में उस कट्टरता की भी आलोचना की, जिसके कारण इस्लाम की नीतियों का अक्षरशः अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है। उन्होंने लिखा है कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं, जबकि इसके विपरित तुर्की जैसे इस्लामी देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया। जब डॉ. अंबेडकर को भारत सरकार अधिनियम 1919 तैयार कर रही साउथ बोरोह समिति के समक्ष गवाही देने के लिए आमंत्रित किया गया तो उन्होंने सुनवाई के दौरान दलितों व अन्य धार्मिक समुदायों के लिए पृथक निर्वाचिका और आरक्षण की मांग की। डॉ. अंबेडकर के इस मांग की तीव्र आलोचना हुई और उन पर आरोप लगा कि वे भारतीय राष्ट्र व समाज की एकता को खंडित करना चाहते हैं। लेकिन सच तो यह है उनका इस तरह का कोई उद्देश्य नहीं था। उनका असल मकसद उन रुढ़िवादी हिंदू राजनेताओं को सतर्क करना था, जो जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति कतई गंभीर नहीं थे। इंग्लैंड से लौटने के बाद जब उन्होंने भारत की धरती पर कदम रखा तो समाज में छुआछूत और जातिवाद चरम पर था। उन्हें लगा कि यह सामाजिक कुप्रवृत्ति और खंडित समाज देश को कई हिस्सों में तोड़ देगा। सो उन्होंने हाशिए पर खड़े अनुसूचित जाति-जनजाति व दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग कर परोक्ष रूप से समाज को जोड़ने की दिशा में पहल तेज कर दी। अपनी आवाज को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने 1920 में, बंबई में साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरुआत की, जो शीघ्र ही पाठकों में लोकप्रिय हो गया। दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान उनके दिए गए भाषण से कोल्हापुर राज्य का स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ बेहद प्रभावित हुआ और डॉ. अंबेडकर के साथ उसका भोजन करना रुढ़िवाद से ग्रस्त भारतीय समाज को झकझोर गया। डॉ. अंबेडकर ने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों को जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति नरमी पर वार करते हुए उन नेताओं की भी कटु आलोचना की, जो अस्पृश्य समुदाय को एक मानव के बजाय करुणा की वस्तु के रूप में देखते थे। ब्रिटिश हुकूमत की विफलताओं से नाराज अंबेडकर ने अस्पृश्य समुदाय को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए एक ऐसी अलग राजनीतिक पहचान की वकालत की, जिसमें कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का कोई दखल न हो। 8 अगस्त, 1930 को उन्होंने एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा और कहा कि हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा और स्वयं राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती। उनको शिक्षित करना चाहिए, उनका उद्धार समाज में उनका उचित स्थान पाने में निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा। उनको शिक्षित होना चाहिए। एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने और उनके अंदर दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है, जो सभी ऊंचाइयों का स्रोत है। इस भाषण में अंबेडकर ने कांग्रेस की नीतियों की जमकर आलोचना की। दरअसल, अंबेडकर ही एकमात्र राजनेता थे जो छुआछूत की निंदा करते थे। जब 1932 में ब्रिटिश हुकूमत ने उनके साथ सहमति व्यक्त करते हुए अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की, तब महात्मा गांधी ने इसके विरोध में पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। यह अंबेडकर का प्रभाव ही था कि गांधी ने अनशन के जरिए रुढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने की अपील की। रुढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं तथा पंडित मदन मोहन मालवीय ने अंबेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा में संयुक्त बैठकें की। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति में, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गांधी के समर्थकों के भारी दबाव के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की मांग वापस ले ली। इसके बदले में अछूतों को सीटों के आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश-पूजा के अधिकार व छुआछूत समाप्त करने की बात स्वीकार ली गई। गांधी ने भी इस उम्मीद पर कि सभी सवर्ण भी पूना संधि का आदर कर सभी शर्तें मान लेंगे, अपना अनशन समाप्त कर दिया। गौरतलब है कि आरक्षण प्रणाली में पहले दलित अपने लिए संभावित उम्मीदवारों में से चुनाव द्वारा चार संभावित उम्मीदवार चुनते और फिर इन चार उम्मीदवारों में से फिर संयुक्त निर्वाचन चुनाव द्वारा एक नेता चुना जाता। उल्लेखनीय है कि इस आधार पर सिर्फ  एक बार 1937 में चुनाव हुए। अंबेडकर चाहते थे कि अछूतों को कम से कम 20-25 साल आरक्षण मिले, जबकि कांग्रेस के नेता इसके पक्ष में नहीं थे। उनके विरोध के कारण यह आरक्षण मात्र पांच साल के लिए लागू हुआ। अस्पृश्यता के खिलाफ  अंबेडकर की लड़ाई को भारत भर से समर्थन मिलने लगा। उन्होंने अपने रवैया और विचारों को रुढ़िवादी हिंदुओं के प्रति अत्यधिक कठोर कर लिया। भारतीय समाज की रुढ़िवादिता से नाराज होकर उन्होंने नासिक के निकट येओला में एक सम्मेलन में बोलते हुए धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट कर दी। उन्होंने अपने अनुयायिओं से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने अपनी इस बात को भारत भर में कई सार्वजनिक स्थानों पर दोहराया भी। 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने एक आमसभा का आयोजन किया, जहां उन्होंने अपने पांच लाख अनुयायिओं का बौद्ध धर्म में रूपांतरण करवाया। तब उन्होंने कहा कि मैं उस धर्म को पसंद करता हूं, जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का भाव सिखाता है। राष्ट्रवाद के मोर्चे पर भी डॉ. अंबेडकर बेहद मुखर थे। उन्होंने विभाजनकारी राजनीति के लिए मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग दोनों की कटु आलोचना की। हालांकि शुरुआत में उन्होंने पाकिस्तान निर्माण का विरोध किया, किंतु बाद में मान गए। इसके पीछे उनका तर्क था कि हिंदुओं और मुसलमानों को पृथक कर देना चाहिए, क्योंकि एक ही देश का नेतृत्व करने के लिए जातीय राष्ट्रवाद के चलते देश के भीतर और अधिक हिंसा होगी। वे कतई नहीं चाहते थे कि भारत स्वतंत्रता के बाद हर रोज रक्त से लथपथ हो। वे हिंसामुक्त समानता पर आधारित समाज के पैरोकार थे। उनकी सामाजिक व राजनीतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। मौजूदा दौर में सभी राजनीतिक दल चाहे उनकी विचारधारा और सिद्धांत कितनी ही भिन्न क्यों न हों, सभी डॉ. अंबेडकर की सामाजिक व राजनीतिक सोच को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। डॉ. अंबेडकर के राजनीतिक-सामाजिक दर्शन के कारण ही आज विशेष रूप से दलित समुदाय में चेतना, शिक्षा को लेकर सकारात्मक समझ पैदा हुई है। इसके अलावा बड़ी संख्या में दलित राजनीतिक दल, प्रकाशन और कार्यकर्ता संघ भी अस्तित्व में आए हैं, जो समाज को मजबूती दे रहे हैं।






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